हिन्‍दी टैक . इन्‍फो

19/08/2011

कुछ भी खरीदने से पहले….

के अंतर्गत भेजा : अवर्गीकृत — admin @ 11:59 pm

अक्‍सर हम बाजार से कई सारी चीजें खरीदकर लाते हैं और लाकर कभी-कभी पछताते भी हैं। हंसिये मत ! मैं कोई विचित्र बात नहीं कर रहा हूँ । आपके साथ भी ऐसा कई बार हुआ होगा जब कोई चीज आपने कुछ और समझकर ली हो, और उसका प्रदर्शन या क्‍वालिटी आपके मन मुताबिक न रही हो । अक्‍सर ऐसा तो जरूर ही हुआ होगा कि चीज की बाजार में कीमत 10 रूपये हो और आप वही सामान 12 रूपये में लाए हों ।

मान भी लिया जाए कि आपके साथ ऐसा कभी नहीं हुआ होगा, तब भी क्‍या बाजार में जो प्रोडक्‍ट आपके मन को भाया हो, क्‍या दुकानदार या शोरूम स्‍टाफ उस प्रोडक्‍ट के बारे में पूरी जानकारी रखता होगा । अगर आपका जवाब हां में है, तो आप इस ब्‍लॉग को आगे पढकर अपना समय नष्‍ट मत कीजिए, यह ब्‍लॉग-पोस्‍ट आपके लिए नहीं है ।

तो मैं बता रहा था कि जब भी आप कुछ खरीदना चाहें, तो (एक आदत बना लीजिए कि) खरीदी जाने वाली हर चीज के बारे में नेट पर दी गई अधिकृत और अनुभवगत जानकारियां अवश्‍य पढें। मेरा अनुरोध है कि आप द्वारा खरीदे गए सामान से संबंधी अपने अनुभव भी विभिन्‍न वेबसाइट्स पर पोस्‍ट अवश्‍य कीजिए ताकि अन्‍य लोग आपके अनुभवों से और आप अन्‍य लोगों के अनुभवों से लाभ उठा सकें।

एक और बात, कम्‍पनियां अक्‍सर साधारण बातों को बढा चढाकर कहती हैं, आप अपने अनुभव से अन्‍य उपयोक्‍ताओं को यह बताएं कि कम्‍पनी क्‍या प्रचार करती है और हकीकत क्‍या है।

15/08/2011

जरूरत ही क्‍या है!

के अंतर्गत भेजा : अवर्गीकृत — admin @ 5:00 pm

मैंने लगभग 14 साल पहले यानि शायद 1997 में कम्‍प्‍यूटर को भरतपुर (राजस्‍थान) में करीब से देखा। छूकर देखा। चलाकर देखा और चस्‍का लगा।
1999 में मेरी शादी हुई। चस्‍का बरकरार था। उसी दौरान मैंने अपना पहला कम्‍प्‍यूटर खरीदा। पर मेरी पत्‍नी, जिन्‍हें मैं कभी मजाक में, कभी प्‍यार से औश्र कभी आदतन ” धन्‍नो जी” कहता हूँ, को कम्‍प्‍यूटर का न कोई शौक था, न उसमें कोई रूचि। मैं देख और सोचकर हैरान होता था, कि कैसे कोई कम्‍प्‍यूटर के चस्‍के के बिना रह सकता है। बाद में कई और लोगों से बात करके मुझे अंदाजा हुआ कि जिस विषय में आपकी जानकारी कम होती है, आपकी रूचि होते हुए भी आप रूचि दर्शा नहीं पाते। मेरी धन्‍नोजी को भी शायद कम्‍प्‍यूटर से इसीलिए ” डर” लगता था।
पर जीवन बहुत विचित्र है पता नहीं किस बात ने मेरी पत्‍नी के मन में कम्‍प्‍यूटर के प्रति रूचि पैदा कर दी (ऐसा मुझे लगता है)। खैर मैं इस बहस में नहीं पड़ना चाहता कि क्‍या वही कारण था या कुछ और, पर जो भी हो, मेरी धन्‍नोजी के मन में रूचि जागी। अब परेशानी ये हुई कि उनका भी मेरी तरह अंग्रेजी में हाथ तंग है।
मुझे कम्‍प्‍यूटर फीवर 104 है और धन्‍नोजी को भी जब ये रोग लगा तो अंग्रेजी का अडंगा। फिर एक दिन बैठे-बिठाए मुझे उस वेबसाइट की याद आई, जिसका नाम है ” वेबदुनिया” । तो मुझे याद आया कि वेबदुनिया वेबसाइट मूलत: हिंदी में है। तो आइडिया आया कि न जाने कितने ही लोग होंगे भारत में जिन्‍हें अंग्रेजी-हिंदी के कारण कम्‍प्‍यूटर और सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी जानकारियां नहीं मिल पाती होंगी।
अंग्रेजी में विकी‍पीडिया जैसा अकूत भण्‍डार मैजूद है, लेकिन हिंदी में तो ऐसा भी नहीं कि किसी शब्‍द का अर्थ ही कोई ढूंढ सके।
फिर निश्‍चय किया कि जो कुछ सीखा है, मैंने 14-15 वर्षों में, कम से कम उसे लिख दूं, ताकि किसी को अगर उन जानकारियों से लाभ मिल सके, तो यही सही। शायद कुछ और लोग भी मेरे साथ इस वेबसाइट पर (या अन्‍य वेबसाइट्स पर) अपनी जानकारियां शेयर करना चाहें। जिससे दुनिया के सबसे बड़े सॉफ्टवेयर निर्यातक देश को अपनी जरूरतों के लिए अमेरिका की कम्‍पनी माइक्रोसॉफ्ट (या किसी अन्‍य कम्‍पनी) का मुंह न ताकना पड़े।

वर्डप्रेस से क्रियाशील